जिनपिंग की साख का सवाल बन गया था डोकलाम, 6 वजहों से बदलनी पड़ी स्ट्रैटजी

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2 दिनों बाद 28 अगस्त को डोकलाम में भारत-चीन सीमा विवाद खत्म हो गया। भारत-चीन अपनी सेना पीछे हटाने पर सहमत हो गए।

नई दिल्ली. भारत और चीन के बीच सोमवार को 72 दिन बाद डोकलाम विवाद खत्म हो गया। दोनों देशों के जवान डोकलाम से अपने-अपने जवानों को पीछे हटाने पर राजी हो गए। इसी बुनियाद पर डोकलाम से जवानों की वापसी ‘आपसी सहमति से’ और ‘एकसाथ’ लेकिन सिलसिलेवार तरीके से होगी। चीन ने इलाके में पैट्रोलिंग की बात कही है। वह डोकलाम में सड़क बनाना रोकेगा या नहीं, इस पर भी चीन ने कुछ नहीं कहा है। माना जा रहा है कि चीन के प्रेसिडेंट शी जिनपिंग के लिए डोकलाम विवाद साख का सवाल बन गया था। जुलाई में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) की 90th एनिवर्सरी के प्रोग्राम में जिनपिंग ने कहा था कि चीन किसी भी घुसपैठिए को हराने की ताकत रखता है। डोकलाम पर चीन ने कई बार धमकी भी दी। इसके बाद डोकलाम में सेना के पीछे हटाने का उसका फैसला चौंकाता है। आने वाले दिनों में अहम घटनाक्रम होने वाले हैं। इसके मद्देनजर जिनपिंग किरकिरी नहीं चाहते। बता दें कि डोकलाम पर दोनों देशों के बीच 16 जून से यह विवाद चल रहा था। इन 6 वजहों से चीन पीछे हटा…

 भारत कहीं BRICS का बायकॉट न कर दे
– नरेंद्र मोदी को अगले हफ्ते ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और साउथ अफ्रीका) समिट में हिस्सा लेने के लिए बीजिंग जाना है। अगर वो इस विवाद की वजह से वहां नहीं जाते तो ये चीन को इंटरनेशनल लेवल पर बड़ा नुकसान माना जाता।
– डोकलाम विवाद जारी रहने तक (16 जून से 28 जुलाई) मोदी की चीन विजिट का भारत की तरफ से आधिकारिक एलान नहीं किया गया था। मसला सुलझने के बाद मंगलवार को भारत ने पीएम के चीन दौरे की बात कही।
– ब्रिक्स समिट इसलिए भी खास है, क्योंकि भारत ने मई में वन बेल्ट-वन रोड (OBOR) समिट में हिस्सा नहीं लिया था। भारत का तर्क था कि चीन-पाक कॉरिडोर पीओके से गुजरेगा। ये भारत की सॉवेरीनटी (संप्रभुता) के लिहाज से सही नहीं है।
2) फिर से सीपीसी का कमान मिलने की उम्मीद
– कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीपीसी) की आने वाले महीनों में 19th नेशनल कांग्रेस होनी है।
– प्रेसिडेंट शी जिनपिंग को उम्मीद है कि सीपीसी के महासचिव के तौर पर उनको पांच साल का दूसरा कार्यकाल मिलेगा।
– जिनपिंग उस कोर ग्रुप को चुनेंगे जो अगले पांच देश को चलाने में उनकी मदद करेंगे। अगर सीमा विवाद आगे बढ़ता तो यह उनकी मुश्किल को बढ़ा सकता था।
3) बॉर्डर पर भारत फौज बढ़ाई, भूटान का साथ मिला
– डोकलाम इलाके में चीन का इंफ्रास्ट्रक्चर बहुत अच्छा है। भारत भी इस गैप को भर रहा है।
– भारत ने चीन से सटे सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के 1400 किलोमीटर लंबे सिनो-इंडिया बॉर्डर पर सैनिकों की तैनाती बढ़ा दी थी। सरकार के मुताबिक, देश की पूर्वी सरहद पर फौज के लिए अलर्ट लेवल बढ़ा दिया गया था। डोकलाम में पहले से ही 350 आर्मी पर्सनल तैनात थे।
– भूटान के मुताबिक डोकलाम में उसका इलाका भी आता है। चीन उसके इलाके में सड़क बनाने की कोशिश कर रहा था। भूटान की गुजारिश पर ही भारतीय जवान वहां पहुंचे तो चीनी सैनिकों को रोका था।
4) जंग से ज्यादा नुकसान होगा, जीतेगा कोई नहीं
– अगर भारत-चीन के बीच जंग होती तो दोनों देशों को भारी जन हो सकती थी। जंग लंबी चल सकती थी। दोनों में से कौन जीतेगा, इसको लेकर असमंजस था।
– विवाद के दौरान अरुण जेटली ने कहा था कि हालात बदल चुके हैं। 1962 वाला भारत अब नहीं रहा।
5) भारत को मिला जापान और अमेरिका का साथ मिला
– चीन ने डोकलाम पर कोई समझौता ना करने की जिद में खुद को कैद कर लिया था, जिससे निकलने का यही रास्ता था।
– बीजिंग सार्वजनिक तौर पर स्वीकार नहीं करना चाहता था कि वह इस मसले पर पीछे हट गया है। हालांकि, अभी उसने ऑफिशियल बयान नहीं दिया है।
– अमेरिका भी पहले कह चुका है कि वो डोकलाम में पहले जैसे हालात का सपोर्ट करता है। जापान ने भी भारत का सपोर्ट किया।
6) भारत के खिलाफ चीन की थ्री वॉरफेयर्स स्ट्रैटिजी फेल
– थ्री वॉरफेयर्स स्ट्रैटिजी के तहत चीन ने भारत को कई धमकियां दीं। बीते 2 महीनों में दी गई धमकियों को इंटरनेशनल लेवल पर कोई तवज्जो नहीं मिली। इसके लिए चीन ने अपने विदेश मंत्रालय और सरकारी मीडिया का इस्तेमाल किया।
– भारत के खिलाफ इस मनोवैज्ञानिक जंग में उसे जीत नहीं मिली। बता दें कि पहले चीन ने फिलीपींस के साथ यही रणनीति अपनाई थी।
– इसी का नतीजा था कि UNCLOS ( संयुक्त राष्ट्र की समुद्री कानून संधि) में चीन के खिलाफ ऐतिहासिक जीत के बावजूद फिलीपींस को झुकना पड़ा था।
क्या था डोकलाम विवाद?
– चीन ने डोकलाम में 16 जून से सड़क बनाना शुरू की थी। भारत ने विरोध जताया तो चीन ने घुसपैठ कर दी थी। चीन ने भारत के दो बंकर तोड़ दिए थे। बता दें कि डोकलाम के पठार में ही चीन, सिक्किम और भूटान की सीमाएं मिलती हैं। भूटान और चीन इस इलाके पर दावा करते हैं। भारत, भूटान का साथ देता है।
चीन ने धमकियां दीं, भारत ने संयम रखा
– चीन ने अपने विदेश मंत्रालय और सरकारी मीडिया के जरिए भारत को कई धमकियां दीं। हालांकि, भारत की तरफ से संयमित बयान दिए गए। सुषमा स्वराज ने संसद में कहा कि बातचीत से ही इस मसले का हल निकलेगा। लेकिन इससे पहले चीन को अपनी सेना वापस बुलानी होगी।
– इसी बीच, 15 अगस्त को चीन के कुछ सैनिकों ने लद्दाख की पेंगगोंग लेक के करीब भारतीय इलाके में घुसपैठ की कोशिश की। भारतीय सैनिकों ने चीनी सैनिकों को रोकने की कोशिश की। इसके बाद दोनों देशों के सैनिकों के बीच पहले हाथापाई हुई। इसके बाद मामला पत्थरबाजी तक पहुंच गया।
अब क्या समझौता हुआ?
– दोनों देश डोकलाम से अपनी- अपनी सेनाएं पीछे हटाएंगे। 16 जून के पहले बॉर्डर पर जो स्थिति थी उसका पालन करेंगे। हालांकि, चीन ने इसका ऑफिशियल एलान नहीं किया गया। न्यूज एजेंसी एएनआई फॉरेन मिनिस्ट्री के हवाले से बताया कि चीन ने बॉर्डर से रोड बनाने के इक्विपमेंट और बुलडोजर्स हटा लिए हैं। लेकिन चीन ने दावा किया है कि वह इस इलाके में अपनी गश्त जारी रखेगा।
1) एक हफ्ते बाद साफ होगी स्थिति (रहीस सिंह, विदेश मामलों के जानकार)
– डोकलाम ट्राइजंक्शन से करीब 30 किलोमीटर ऊपर डोकला पठार और डोकलाम से 15 किलोमीटर नीचे तक के इलाके पर चीन अपना दावा करता रहा है।
– यहां की जियोग्राफिक कंडीशन के आधार पर चीन कमजोर नहीं है। चीन अगर कह रहा है कि भारतीय सेना पीछे हटने को तैयार हो गई है और उसकी सेनाएं वहां गश्त करती रहेंगी। इसका मतलब कि मौजूदा टकराव दूर हो गया है, लेकिन डोकलाम का विवाद बरकरार है।
– चीन पहले ही कह चुका था कि डोकलाम में भारत के 400 सैनिक थे, जिनमें से 300 लौट चुके हैं। कुल मिलाकर दोनों देशों में क्या समझौता हुआ है इस पर करीब एक हफ्ते में स्थिति साफ हो सकती है।
– मोदी ब्रिक्स समिट में जा सकते हैं, क्योंकि ये मल्टीलेट्रल प्लेटफॉर्म है।
– वन बेल्ट वन रोड समिट से भारत इसलिए दूर रहा था, क्योंकि ये चीन का प्रोजेक्ट था और सीपैक का हिस्सा था। ये भारत की सॉवेरीनिटी के खिलाफ था।
2) फैसले का भारत-चीन की सेना को स्वागत करना चाहिए (निरुपमा राव, भारत की पूर्व फॉरेन सेक्रेटरी)
– “डोकलाम में डिसएंगेजमेंट के फैसले का भारत और चीन दोनों की सेना को स्वागत करना चाहिए। हालांकि अभी भी दोनों देशों के बीच कई सवालों के जवाब नहीं मिले हैं। इन्हें खारिज नहीं किया जा सकता।”
– “बीते दो महीनों में जो हुआ, उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि दोनों देशों के रिश्तों के अंदर खदबदा रहा है। इसे गंभीर मसला मानना चाहिए। भारत-चीन रिलेशनशिप में एक नया और जटिल चैप्टर शुरू हुआ है। ये पूरे क्षेत्र पर असर डालता है।”
– “पूरे मसले का सार कहें तो भारत-चीन बॉर्डर पर बीते 3 दशकों से चले आ रहे स्टेटस-को (यथास्थिति बनाए रखना) में खलल पड़ा है।”
3) तन्वी मदान (ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूट)
– “सबसे अहम ये है कि मसले को ज्यादा उछाला नहीं गया और डिप्लोमैटिकली हल कर लिया गया। चीन ने भारतीय सेना के पीछे हटने पर ही बातचीत की शर्त रखी थी। लेकिन दोनों देश बातचीत से एकसाथ सेना हटाने पर राजी हो गए।”

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