ये 5 आंकड़े बडा सकते हैं मोदी सरकार के लिए खतरे की घंटी है..

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New Delhi: Prime Minister Narendra Modi after inaugurating an exhibition titled “Swachchhagrah – Bapu Ko Karyanjali - Ek Abhiyan, Ek Pradarshani” organised to mark the 100 years of Mahatma Gandhi’s 'Champaran Satyagraha' at the National Archives of India in New Delhi on Monday. PTI Photo by Shahbaz Khan(PTI4_10_2017_000271A)

नई दिल्ली.. गिरती GDP ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर वित्त मंत्री अरुण जेटली के लिए चिंताएं बढ़ा दी हैं। पहले से ही नोटबंदी और GST की वजह से स्लोडाउन झेल रही इकोनॉमी के लिए आने वाले दिन भी परेशानी वाले हो सकते हैं। इस बात का अलर्ट अब इकोनॉमिस्ट कर रहे हैं। एसबीआई रिसर्च रिपोर्ट ने साफ तौर सरकार को अलर्ट करते हुए कहा है कि GDP में गिरावट टेक्निकल नहीं है, यह रियल है। ऐसे में सरकार को खर्च बढ़ाने होंगे, नहीं तो आने वाले दिन इकोनॉमी के लिए और परेशानी भरे हो हैं। अर्थशास्त्रियों के अनुसार अब समय आ गया है कि सरकार इकोनॉमी को रफ्तार देने के लिए तुरंत कदम उठाएं।

इन फैक्टर ने सरकार की बढ़ाई परेशानी

GDP – साल 2017-18 की पहली तिमाही में GDP 5.7 फीसदी के लेवल पर आ गई है। जो कि पिछले 3 साल का सबसे निचला लेवल है। यही नहीं इसे बड़ी चिंता की बात यह है कि GDP में लगातार छठी  छठी तिमाही में गिरावट का दौर जारी है।   रोजगार में कमी- क्रिसिल के अनुसार पिछली दो तिमाही के आंकड़ों में सबसे चिंता की बात यह है कि GDP ग्रोथ में स्लोडाउन की वजह से नई नौकिरियां नहीं आ रही है। इसके तहत उससे बड़ी चिंता यह है कि इस सुस्ती में ऐसे सेक्टर ग्रोथ कर रहे हैं, जहां ज्यादा नौकरियों के अवसर नहीं है।जबकि ज्यादा लेबर इन्सेंटिव सेक्टर में ग्रोथ गिर गई है।

रोजगार में कमी- क्रिसिल के अनुसार पिछली दो तिमाही के आंकड़ों में सबसे चिंता की बात यह है कि GDP ग्रोथ में स्लोडाउन की वजह से नई नौकिरियां नहीं आ रही है। रिपोर्ट के अनुसार ट्रेड, होटल, ट्रांसपोर्ट, कम्युनिकेशन, सर्विस, इलेक्ट्रिसिटी, गैस, डिफेंस, पब्लिक एडिमिनिस्ट्रेशन सेक्टर ऐसे हैं जहां ग्रोथ GDP की तुलना में कहीं ज्यादा है। लेकिन इन सेक्टर में 10 लाख रुपए की इनकम के लिए केवल 6 लेबर की जरूरत है। जबकि कंस्ट्रक्शन, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर   जहां 7-12 लेबर की जरूरत है, वहां ग्रोथ गिर रही है। जो सरकार के लिए चिंता की बात है। इसी तरह कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का भी दावा है कि देश में हर रोज 30 हजार युवा जॉब मार्केट में आ रहे है और सरकार केवल 500 लोगों को ही रोजगार दे पा रही है।

बढ़ता चालू खाता घाटा

इकोनॉमिस्ट पई पनंदिकर के अनुसार सरकार के लिए बढ़ता चालू खाता घाटा भी परेशानी का सबब बन रहा है। अप्रैल से जून की तिमाही में चालू खाता घाटा बढ़कर GDP के 2.4 फीसदी के लेवल पर पहुंच गया है। जो कि करीब 14.3 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। इसकी प्रमुख वजह इम्पोर्ट के मुकाबले एक्सपोर्ट में ज्यादा कमी आना है। पनंदिकर के अनुसार आरबीआई को एक्सपोर्ट्स को राहत देने के लिए रुपए को डेप्रिशिएट करने की दिशा में कदम उठाने चाहिए।

बैंकों को फंसे कर्ज पर राहत नहीं

पनंदिकर के अनुसार सरकार ने बैंकों के एनपीए कंट्रोल करने में कई नीतिगत फैसले लिए हैं, लेकिन अभी भी उसका इम्पैक्ट नहीं दिख रहा है। करीब 40 बड़ी कंपनियों के पास 2 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है, जो फंसा हुआ है। ऐसे में बैंक नए प्रोजेक्ट कर्ज देने से परहेज कर रहे हैं। यह स्थिति तब है जब नोटबंदी के बाद बैंकों के पास लिक्विडिटी काफी बढ़ गई है। बैंक रिस्क लेने से बच रहे हैं। एसबीआई रिपोर्ट के अनुसार साल 2017-18 में 18 अगस्त तक इंक्रीमेंटल क्रेडिट ग्रोथ क्रेडिट ग्रोथ में 1.37 लाख करोड़ की कमी आई है।

नहीं बढ़ रहा है प्राइवेट सेक्टर का खर्च

क्रिसिल रिपोर्ट के अनुसार प्राइवेट सेक्टर अभी भी खर्च से बच रहा है। जिसका असर इन्वेस्टमेंट और जॉब पर दिख रहा है। पनंदिकर के अनुसार इस समय सरकार के पास रास्ता यह है कि वह अपने खर्च बढ़ाए। साथ ही राज्यों का खर्च इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर प्रोजेक्ट पर बढ़ाए। अगर ऐसा नहीं होगा तो तो इकोनॉमी को स्लोडाउन से निकालना आसान नहीं होगा।  …

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