भारत और चीन के बीच सिक्किम में चल रहे सीमा-विवाद …..

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नई दिल्ली और बीजिंग के बीच एक दूसरे को दिमागी खेल में मात देने की कोशिशों के बीच बर्फीले डोकलाम में एक अलग ही तरह का मुकाबला दरपेश है जहां भारत के 250 सैनिक चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के सामने डटे हुए हैं.

फ़र्स्टपोस्ट को हासिल सूचना के मुताबिक डोकलाम में जुझारु तेवर वाले जाट रेजिमेंट के 250 सैनिक दो स्तरों पर तैनात किए गए हैं. करगिल की जंग में कमाल दिखाने वाली बोफोर्स गन सहित तोपों की एक तीसरी पांत भी डोकलाम में तैनात है जो दुश्मन के परखच्चे उड़ाने का माद्दा रखती है.

चीन के रक्षा मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने 24 जुलाई को बड़बोलापन दिखाते हुए कहा कि ‘पहाड़ को हिलाना आसान है लेकिन पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को नहीं.’
जाट रेजिमेंट के जवानों को अभी डोकलाम की सरजमीं पर तैनात किया गया है और सारे अनुमान यही संकेत करते हैं कि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के लिए अपनी सरजमीं पर डट कर खड़े इन लंबे-तगड़े जवानों को डिगाना बहुत मुश्किल साबित होगा. यह संभावना इसलिए भी बनती है क्योंकि डोकलाम का इलाका अपनी बनावट में भारतीय फौज के अनुकूल है, हिंदुस्तानी फौज को पहाड़ी इलाकों की जंग में महारत हासिल है.

दूसरी पांत के सैनिकों को चेतावनी दी गई है कि मुस्तैदी में जरा भी ढील नहीं आनी चाहिए और दुश्मन के खेमे से जैसे ही हमले का कोई संकेत मिले, सारे हथियारों के साथ एकबारगी उस पर टूट पड़ना है.

डोकलाम में धीरज ही कामयाबी का मूलमंत्र है. यहां जो छवि आपके मन में सबसे पहले कौंधती है वह घात लगाकर छुपे बैठे ड्रैगन और पूरे चौकन्नेपन के साथ दम साधकर खड़े बाघ की है.

पानी का घूंट भरना हो, भोजन का निवाला मुंह में रखना हो या फिर चंद घड़ी की झपकी लेनी हो- यहां अपने शिविर में सैनिक सबकुछ बहुत जल्दी-जल्दी करते हैं. इन्हें नींद जब आ जाए उसका उसी दम स्वागत है क्योंकि इससे तनी हुई नसों को कुछ देर का आराम मिलता है.

ज्यादातर हिंदुस्तानी फौज ट्राइ जंक्शन से 10 किलोमीटर की दूरी पर काबिज है. एक पंजाबी सैनिक ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया कि ‘डोकलाम में हम लोग दुश्मन के बिल्कुल करीब हैं. उनके और हमारे बीच बस 250 मीटर का फासला है.’

एक सैनिक ने कहा कि सीमा-विवाद के भड़कने पर सबसे पहले वहां ब्लैककैट प्लाटून की तैनाती हुई. इसके बाद नाथू ला के बेसकैंप से जाट रेजिमेंट की टुकड़ी बुलायी गई. वहां मौजूद एक और पत्रकार ने इस बात की पुष्टी की. उसने कहा कि मैं डोकलाम में भारतीय सैनिकों की तैनाती की जगह तक जा चुका हूं.
शायद यही वजह रही होगी जो फ़र्स्टपोस्ट की टीम को नाथू ला में एक खास मुकाम के बाद आगे नहीं जाने दिया गया. डोकलाम को मीडिया की पहुंच से दूर रखा गया है क्योंकि चीन अपने राजकीय नियंत्रण वाले मीडिया के जरिए इस इलाके की खबरों को तोड़-मरोड़कर पेश करने के दूसरे रास्ते तलाश सकता है.

नई दिल्ली का मानना है कि बीजिंग दरअसल सभी देशों के साथ मनोवैज्ञानिक जंग की रीत अपनाता है और फिलहाल मनोवैज्ञानिक युद्ध लड़ने के ख्याल से ही वह अपने मुहावरों की पेशबंदी कर रहा है. लेकिन, नई दिल्ली का मानना है कि चीनी मुहावरों की एक नहीं चल रही है, भारत ने अपने जवाब से उन्हें भोथरा कर दिया है.

नाथू ला में तैनात एक सैनिक का कहना था कि ‘पीपुल्स लिबरेशन आर्मी डोकलाम में क्लास 4 रोड के विस्तार की कोशिशों से पहले ही तैयारी में जुटी हुई थी.’ सैनिक ने यह भी बताया कि भारतीय फौज ने मेकशिफ्ट (बनाओ-हटाओ) किस्म के बंकर बनाए हैं लेकिन चीनी सेना के बनाए बंकर स्थायी किस्म के हैं. इस सैनिक का कहना था, ‘लेकिन हम जवाबी हमले के लिए तैयार हैं. हमारी सप्लाई-लाइन बिना किसी बाधा के जारी है और तीन परतों वाला हमारा सुरक्षा घेरा अभेद्य है.’
सेना के एक अधिकारी ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया कि सितंबर आने के बाद डोकलाम बर्फ से ढक जाएगा.

ऐसा जान पड़ा कि सुषमा स्वराज ने 3 अगस्त को राज्यसभा में जो अमन और शांति की बात की थी, वह सब व्यर्थ साबित हुआ.

नाथू ला धरातल से 14000 फीट की ऊंचाई पर है. ट्राइ-जंक्शन पर कटार के आकार वाली चुंबी घाटी है जहां से ठीक सीध में हमारा सिलीगुड़ी वाला गलियारा नजर आता है. काफी तंग होने के कारण इसे चिकेन नेक (मुर्ग की गर्दन) कहा जाता है.
भूटान डोकलाम को एक विवादित क्षेत्र मानता है और भारत का मानना है कि डोकलाम इलाके में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की सड़क बनाने की कोशिश उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए प्रत्यक्ष खतरा है. भारत का सुरक्षा-तंत्र चिंतित है कि कहीं चीन पूर्वोत्तर के इलाके से भारत का संपर्क काट देने का खेल तो नहीं रच रहा है.
इस सैनिक ने बताया कि जहां दोनों देशों की सेना आमने-सामने डटी है वहां से हमारी सेना का बेस कैंप केवल 15 किलोमीटर दूर है.
मनोबल को ऊंचा बनाए रखने के लिए सेना के अधिकारी ट्राइ-जंक्शन पर तैनात सैनिकों को जोश जगाने वाले संदेश देते हैं. सैनिकों को वे पूरे एहतराम से याद दिलाते हैं कि चाहे जो भी कीमत चुकानी पड़े लेकिन निशाना बनाए रखते हुए मुस्तैदी बरकरार रखनी है.

एक फौजी ऑफिसर ने कहा कि ‘जब भी सैनिक अपनी ड्यूटी से लौटते हैं, वरिष्ठ अधिकारी उनसे भेंट करने का कोई मौका नहीं चूकते. हम लोग सैनिकों से बात करते हैं और उनकी चिंताओं को दूर करते हैं. अगर हमें सैनिकों में क्रोध, निराशा या बेचैनी के लक्षण दिखाई देते हैं तो हम उन्हें ड्यूटी से हटा लेते हैं. दोनों तरफ से जारी मनोवैज्ञानिक युद्ध की स्थिति सबसे बेहतरीन सैनिक को भी अपनी चपेट में ले लेती है. ऐसी तनाव भरी हालत में यह ध्यान रखना बहुत अहम है कि हर सैनिक का मनोबल ऊंचा बना रहे.’
हिंदुस्तानी फौजियों ने सिक्किम के पहाड़ी इलाके में हैलीपैड बनाए हैं. कुपुक और जुलुक नाम के गांव के बाशिन्दों की मदद से लंबी-लंबी झाड़ियों को हटाकर जगह चौरस कर दी गई है. सैनिक स्थानीय लोगों के साथ चाय-पान करते हुए उन्हें अपना दोस्त बना लेते हैं.

 

 

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