बच्चों में तेजी से बढती आपरधिक प्रवृत्ति..

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शरारती और लापरवाह बच्चों की वजह से टीचर्स भी कम परेशान नहीं हैं। बिगड़ैल बच्चों से शिक्षण संस्थानों का माहौल बिगड़ रहा है सरकारी शैक्षणिक संस्थाओं की बुरी स्थिति की वजह से प्राइवेट स्कूल मशरूम की तरह उग आए हैं। इनका इकलौता मकसद पैसा कमाना है। वे छोटी क्लास में ऐडमिशन के लिए भी लाखों रुपये डोनेशन लेते हैं। ऐसे में वे बच्चे भी स्कूल-कॉलेजों में खूब पहुंच रहे हैं, जिनकी पढ़ाई में कोई दिलचस्पी नहीं होती। वे बस वहां समय काट रहे होते हैं। जाहिर है, वे खुराफात में आगे रहते हैं।

बुलीइंग चरम पर है। टीचरों की शिकायत आम होने लगी है कि चंद बदमाश बच्चों, उनके पैरंट्स और स्कूल मैनेजमेंट के बीच वे फुटबॉल बनकर रह जाते हैं। एक टीचर ने कहा ‘स्कूल मैनेजमेंट बच्चों की परफॉर्मेंस और अनुशासन के लिए टीचर को जिम्मेदारी देकर निश्चिंत हो जाते हैं। लेकिन टीचर के साथ दिक्कत यह है कि वह बच्चों को डांट भी दें तो बच्चे और पैरंट्स पीछे पड़ जाते हैं।  पैरंट्स  स्कूल मैनेजमेंट के पास शिकायत कर सकते हैं। अधिकतर मामलों में पैरंट्स का रवैया सकारात्मक नहीं रहता, जबकि मैनेजमेंट मामले में दखल देने से पहले यह देखता है कि उस बच्चे के पैरंट्स रसूखदार तो नहीं हैं! ऐसे में बेपरवाह बदमाश बच्चे दुस्साहसी बन जाते हैं और कुछ भी कर गुजरते हैं। लोगों की यह सोच भी कम जिम्मेदार नहीं कि हर बच्चे को पढ़कर अच्छे नंबर लाने चाहिए। यह मासूमों पर दबाव पैदा करता है

 

पैरंट्स की उदासीनता इस मामले में सबसे ज्यादा घातक है। एक्सपर्ट मानते हैं कि अधिकतर पैरंट्स कमाने या दूसरे कामों में इतने बिजी हैं कि बच्चों को लेकर वे उदासीन हैं। यह खुद उन पर, उनके बच्चों के अलावा दूसरों पर भी भारी पड़ता है।
मेंटल हेल्थ को लेकर अज्ञानता के कारण अक्सर पैरंट्स बच्चों के असामान्य व्यवहार को बचपना या चंचलता मानकर इग्नोर करते रहते हैं। उन्हें तब तक अपनी इस गलती का अहसास नहीं होता है, जब तक कि बच्चा किसी बड़ी गलती को अंजाम नहीं दे देता।
  पैरंट्स को भी दिखावे से बचना चाहिए। अगर बच्चा पढ़ने में रुचि नहीं ले रहा तो जबर्दस्ती उसे स्कूल या कॉलेज अटेंड करने के लिए न कहें। अब जमाना वह नहीं रहा कि सिर्फ पढ़ने वाले ही काबिल माने जाते हैं। अगर आपका बच्चा कुछ अलग करना चाह रहा है तो उसे करने दें, न कि पढ़ने के लिए मजबूर करें। बच्चे की हॉबी पर भी ध्यान दें। कोशिश कर बचपन से ही बच्चों में किसी-न-किसी हॉबी के लिए प्यार पैदा करें, इससे वे बुराइयों से दूर रहेंगे।

नाबालिग बच्चे द्वारा एक मासूम का कत्ल कोई सामान्य बात नहीं है। ऐसे खौफनाक क्राइम के लिए बहुत हिम्मत और प्लानिंग की जरूरत होती है। यह काम वही कर सकता है जो मानसिक रूप से दुरुस्त न हो। दिक्कत यह है कि हम भारतीय मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम पर ध्यान बिल्कुल नहीं देते। लगभग 14 प्रतिशत भारतीय आबादी मेंटल डिसऑर्डर की शिकार है और इनमें से लगभग 11 फीसदी को हर हाल में फौरन इलाज की जरूरत है, लेकिन हम भारतीय इसे लेकर उदासीन हैं। अगर पैरंट्स और समाज बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या को शुरुआती स्तर पर पहचान लें और सही से गाइड करें तो गुरुग्राम के स्कूल जैसी घटनाएं नहीं होंगी।’

एक्सपर्ट मानते हैं कि शिक्षा संस्थानों को कमाई से मतलब है। वे यह नहीं देखते कि उनकी कमाई के लालच का बुरा असर मासूम बच्चों और टीचरों को किस रूप में भुगतना पड़ रहा है!
कानून ने टीचरों के हाथ बांध दिए हैं। बदमाशी करने पर वे ठीक से डांट भी नहीं सकते।
पैरंट्स की जिद रहती है कि बच्चों को हर हाल में पढ़ना ही चाहिए। वे पढ़ेंगे नहीं तो करेंगे क्या?
बच्चों का मन पढ़ाई में न लगने के बावजूद पैरंट्स उन्हें जबर्दस्ती स्कूल भेजते हैं, ताकि समाज में उनकी नाक ऊंची रहे। उत्तर भारत में यह कुछ ज्यादा है।

पैरंट्स अपने बच्चों की गलतियों पर पर्दा डालने के लिए तमाम जतन करते हैं, लेकिन बच्चे अनुशासन में रहें, यह स्कूल-कॉलेज की भी जिम्मेदारी है। ‘एक दिन मैं अपने एक स्टूडेंट का पिछला रेकॉर्ड चेक कर रही थी। मैंने देखा कि वह एक ऐसे मिशनरी स्कूल में पढ़ा था जिसका नाम हिंदू देवता गणेश के नाम पर था। मैंने जब उसकी हकीकत पूछी तो वह सकपका गया। असल में उसके पैरंट्स ने प्रफेशनल कोर्स में उसे ऐडमिशन दिलाने के लिए जिस फर्जी सर्टिफिकेट का जुगाड़ किया था, उसमें इतनी बड़ी गलती थी। असल में उस लड़के की पढ़ने में जरा भी दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन उसका पिता हरियाणा का रसूखदार आदमी था, इसलिए उसका अच्छे कॉलेज में ऐडमिशन करा दिया। सवाल है कि क्या कॉलेज को पिछले सर्टिफिकेट की सत्यता परखने के बाद ही ऐडमिशन नहीं देना चाहिए? दरअसल, कोई भी मुंह उठाए ऐसे ही प्रफेशनल डिग्री लेने आ जाएगा तो कैंपस की स्थिति अराजक होगी ही।’
  प्रद्युम्न मर्डर जैसे कांड को रोकने के लिए सबसे बड़ी भूमिका पैरंट्स को निभानी होगी। एस. के. सिंह कहते हैं, ‘पैरंट्स की जिम्मेदारी सबसे अहम है। आमतौर पर बदमाश बच्चे भी स्कूल के माहौल में बदमाशी नहीं कर पाते। उन्हें पता होता है कि उन्हें अनुशासन में रहना है, लेकिन दिक्कत उन मामलों में होती है, जब पैरंट्स पावर या पैसे के गुरूर में चूर हों या फिर बच्चों के वर्तमान और भविष्य को लेकर आला दर्जे के उदासीन हों। दोनों ही स्थितियों में आशंका रहती है कि ऐसे पैरंट्स के बच्चे स्कूल में समस्या खड़ी करने वाले होंगे।

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