पहाड की महिलाओं की व्यथा………….

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पहाड का जीवन एक चुनौतियों से भरा जीवन हैं जिन चुनौतियों से सबसे ज्यादा महिलाों को जूझना पडता हैं। हमारे पहाड़ की महिलाएं बहुत ही कर्मठ और मेहनती होती हैं हमारे पहाड़ के घरों को आबाद करने में महिलाओं की भूमिका पुरुषों से कई ज्यादा रही हैण् पहाड की महिलायें जीवन के प्रत्येक उतार चढाव के लिए सदैव कर्मठता के साथ तैयार रहती हैं। वे सुबह सुबह से ही काम पर लग जाती हैं । सुबह से शाम तक काम ही काम पहाड़ की नारी की पहचान होती हैं। पहाड़ की महिलाएं अपने लिए भी समय नही निकाल पाती हैं, बाहरी देश दुनिया मानो उनके लिए कुछ नही है अपने छोटे छोटे बच्चों को लेकर महिलायें खेतों में काम करती हैं ऊचें ऊचें पहाडों में जाकर पशुओं के लिए चारा लाती हैं। जीवन व्यापन इतना कठिन है की खुद के लिए भी समय निकालना मुश्किल होता है, इन सब के बीच भी वो अपने बच्चो की अच्छे से देख रेख करती हैं पहाड की एक प्रसिद्व महिला गौरा देवी जिसने पेडों को कटने से रोकने के लिए एक आन्दोलन चलाया जिसे नाम दिया गया चिपको आन्दोलन। महिलाओं ने अपनी ही सम्पदा से वंचित होने से इनकार कर दिया। जिसमें जंगली पशु एवं प्राकृतिक सम्पदा को बचाने के लिए, वनों को बचाने के लिए ग्रामीण एवं शहरी सभी स्तर पर प्राकृतिक अधिकार के लिए आन्दोलन तेज किया। 12 साल की उम्र में गौरा देवी का विवाह हो गया था और वे 22 साल में विधवा हो गईं थीं। एक पहाड़ी विधवा के सारे संकट उन्हें झेलने पड़े पर इन्हीं संकटों ने उनके अपने अन्दर निर्णय लेने की क्षमता विकसित की। वे गाँव के कामों में दिलचस्पी रखने वाली गाँव की बुजुर्ग महिलाओं में एक थीं। समाजिक एकता के नेतृत्व का गुण उनमें था। जो कठिन परिस्थितियों में निखरता गया। समाज के सभी जिम्मेदारियों से बंधी महिलाएं परन्तु हमारे पुरूष प्रधान समाज ने कभी भी महिलाओं को बराबरी का दर्जा नहीं दिया और सदैव से इन मेहनती महिलओं का सामाजिक शोषण हुआ हैं।
वर्तमान परिपेक्ष में स्थितिः- पहाड की महिला की स्थिति और समाज में महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण में बहुत प्रगित हुई हैं पहाड की महिलायें राजनीति में शिक्षा में आगे बढ रही हैं महिलाओ ने कई स्तर पर खुद को साबित किया हैं और महिला विकास में अग्रसर हुई हैं। समाज में बदलाव के लिये महिलाओं ने शिक्षा, राजनीति आदि कई क्षेत्र में आगे हुई हैं जिसमें कुछ नाम उल्लेखनीय हैं। बछेन्द्रीपाल भारत की प्रथम एवरेस्ट विजेताए हंसा मनराल द्रोणा पुरूस्कार से सम्मानित प्रथम महिलाए, ज्योतिराव पाण्डे, उत्तराखण्ड की प्रथम आईएएस महिला, प्रथम महिला मेजर जनरल, गौरा देवी, विजया वर्थवाल आइरिन पन्त,सुशाीला डोभाल, बसंती बिष्ट जैसे महिलाओं से इन महिलाओं की प्रगति के द्वार खोले हैं।

निष्कर्षः- पहाड की महिलाओं के लिए पढे लिखे होने का क्या अभिप्राय हैं, क्या अनपढ होना महिलाओं के विकास में सबसे बढी बाधा बना या उत्तराखंड में महिलाओं की समस्याओं को सुनने और हल करने में उत्तराखंड राज्य महिला आयोग समक्ष नहीं हैं। पीड़ित महिलाओं की समस्याओं का मुफ्त समाधान किया जाना चाहिए। महिलायें पूरी जिम्मेदारीयें से अपने परिवार का पालन करती हैं। क्या इन महिलाओं की मेहनत आजीवन यूंही बरबाद होती रहेगी कभी भी महिलाओं को उनकी मेहनत का पूर्ण फल नहीं मिला हैं कहने के लिए तो कई सरकार की कई योजना पहाड की महिलाओं के लिए निकाली जाती हैं पर क्या इन योजनाओं का लाभ इन महिलाअ तक पहुंच जाता हैं। उनके भी वही सपने हैं जो मेट्रो शहर में रहने वाली माताये अपने बच्चों के लिए देखती हैं  इतना काम करने के बाद भी वो चेहरे पे ख़ुशी, इंसानियत, ईमानदारी दुसरो के लिए कुछ अच्छा करने की चाह रखती हैं। पहाड़ी महिलाओं के इस कठिन परिश्रम और उनके जज्बे को सलाम।
‘‘तीर्थ स्थल देवभूमि, फिर भी जिन्दगी सूनी’’ जिस उत्तराखण्ड में चार धाम के श्रद्वालुओ की भीड हो जिस देवभूमि की जमीन हिमालयों जैसे ऊचांईयों को छूती हो उस देवभूमि की महिला पहाडों की ऊंचाईयों में रहकर भी धरती में गिरी पडी हैं जिस मिटटी में भगीरथ नेे गंगा का वेग रोकने के लिए तपस्या कर शिवजी को गंगा में आने के लिए विवश किया हो उस भूमि की महिला की कबलियत को किसी ने क्यूं नहीं समझा। जिस उत्तराखण्ड में नन्दजात यात्रा में माॅ नंदा देवी को विदा करने के लिए पूरे देश से लोग सम्मान देने आते वहीं बेटी को हक नहीं ऐसे अधिकारों का।’’

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