इन कारणों से हो रहा हैं आज का युवा मानसिक रोगी….

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दरअसल मानव मस्तिष्क में अपार संभावनाए होती हैं। अगर ये संभावनाए आपके अनुकूल काम करती हैं तो आपका जीवन खुशियों से भर उठता है। लेकिन अगर ये आपके खिलाफ काम करने लगीं तो फिर आपको कोई नहीं बचा सकता। दरअसल, इस स्थिति में आपकी पीड़ा का कारण कहीं बाहर से नहीं आ रहा। अगर आपकी पीड़ा का कारण कहीं बाहर से मसलन आपके पड़ोस, आपकी सास या आपके बॉस की तरफ से आ रहा होता तो आप उससे भाग सकते थे। वे कुछ करते, जिसके बदले में आप एक खास तरह से उस पर प्रतिक्रिया देते। लेकिन आप एक ऐसी जगह या हालात में है, जहां बिना किसी के कुछ किए भी अपने आप तकलीफें आ रही हैं तो यह अपने आप में एक मनोवैज्ञानिक स्थिति होगी।

इस बीमारी से नुकसान कितना हुआ है। कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो इससे बाहर आ जाते हैं, लेकिन वहीं कुछ लोगों में यह समस्या एक भौतिक रूप ले लेती है और मस्तिष्क का नुकसान कर देती है। इस स्थिति में दवाइयों के जरिए उसकी बाहर से मदद करनी पड़ती है। ऐसी स्थिति में लोग बड़े पैमाने पर सीडेटिव (ऐसी दवाइयां जो मानसिक शांति के लिए दी जाती हैं) का सेवन कर रहे हैं, लेकिन इसमें एक खतरा है कि इनका असर सिर्फ एक हिस्से में न होकर पूरे दिमाग में होता है।

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आप गुस्से, नफरत, ईर्ष्या, शराब या मादक चीजों की लत के चलते इस रेखा को पार करते रहते हैं। आप समझदारी की रेखा को लांघते रहते हैं, साथ ही आप इस दौरान होने वाले पागलपन का भी मजा लेते रहते हैं और फिर इस स्थति से बाहर आ जाते हैं। मैं चाहता हूं कि आप जानें कि बहुत से लोग इसी कोशिश में बर्बाद हो गए। कभी ये लोग हमारी-आपकी तरह बिलकुल सामान्य थे। लेकिन एक दिन सबकुछ खत्म हो गया। एक दिन अचानक कहीं कोई फ्यूज उड़ा ओर वे सड़कर पर आ गए।

इसी तरह से हमारे शरीर में बीमारी आती है। हो सकता है कि आज आप पूरी तरह से ठीक हों और कल सुबह आपका डॉक्टर आपसे कुछ और कहे। इस तरह की चीजें लोगों के साथ हर रोज हो रही है। यही चीज इंसान के दिमाग के साथ भी हो सकती है। अगर यह चीज आपके शरीर के साथ होती है यानी आप शारीरिक रूप से बीमार पड़ते हैं तो कम से कम आपको अपने आसपास के सब लोगों से हमदर्दी मिलती है, लेकिन अगर यही दिक्कत आपके दिमाग के साथ हो जाए तो आपको हमदर्दी मिलने की संभावना ना के बराबर होती है। तब कोई भी आपके आसपास नहीं रहना चाहता, क्योंकि मानसकि रूप से बीमार व्यक्ति को झेलना बहुत मुश्किल है। ऐसे में आपको भी पता नहीं होता कि कब वे बीमार हैं और कब वे बीमारी का नाटक कर रहे हैं, आप इसका फैसला नहीं कर पाते। जब वे बीमारी का नाटक कर रहे होते हैं तो आप उनके प्रति कठोर रुख अपनाते हुए उन पर काबू पाना चाहते हैं, लेकिन जब वे सच में बीमार होते हैं तो आपको उनके प्रति करुणा रखनी चाहिए। यह कोई आसान काम नहीं है, बिल्कुल दो छोरों पर बंधी रस्सी पर चलने जितना मुश्किल है। यह पीड़ित व्यक्ति के लिए कष्टदायक तो है ही, लेकिन उससे ज्यादा कष्टदायक उसके आसपास के लोगों के लिए होता है।

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आज हालत ये है कि गांवों में भी आपको मनोवैज्ञानिक रूप से पीड़ित लोग मिल जाएंगे, जबकि अतीत में अपने यहां ऐसा नहीं था। अगर अतीत में कहीं कुछ हुआ भी तो उसकी संख्या लगभग ना के बराबर रही। लेकिन अब यह संख्या लगातार बढ़ रही है। आप तथाकथित धनी या समृद्ध समाज में साफ तौर पर देख सकते हैं कि वहां इनकी तादाद अपेक्षाकृत काफी अधिक है। इसकी वजह है कि जब तक इंसान खास चीजों का अतिक्रमण नही करता, वह एक सामाजिक प्राणी के तौर पर रहता है। या तो हमारी कोशिश करने की होनी चाहिए या फिर हमें एक ऐसे समाज का निर्माण करना चाहिए, जो उसमें रहने वालों पर अत्यधिक बोझ डालने की बजाय एक सहयोगी माहौल मुहैया करा सके। फिलहाल हम जो सामाजिक संरचना बना रहे हैं, वह बहुत ज्यादा अपेक्षा रखने वाली और बोझ डालने वाली है।

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आज समाज में ऐसे बहुत से ढांचे हैं जिन्हें क्रूर कहा जा सकता है, जो इंसान की भलाई और कल्याण के हिसाब से बिल्कुल उचित नहीं हैं। दरअसल, हम तो बस उन बड़ी मशीनों के पुर्जे बनाने की कोशिश कर रहे है, जो हमने बनाई हैं। हम चाहते हैं कि ये मशीने बनी रहें, सुचारु रूप से चलती रहें, लेकिन इस कोशिश में एक इंसान के साथ क्या हो रहा है, हम इसकी बिल्कुल परवाह नहीं करते।