अगर सरकार मिटाये “पराली कीर परेशनी तो चलती रहे खुशहल किसानी”

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दिल्ली  में स्मॉग के लिए पराली जलाने को प्रमुख कारण बताया जा रहा है। पराली निस्तारण के सस्ते तरीके के अभाव में पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उप्र के खेतों में इसे जला दिया जाता है। किसानों के लिए अभी यही सबसे सस्ता और आसान उपाय दिखता है। इसी के चलते उत्तर भारत में हर साल धुंध की जहरीली परत छा जाती है। प्रदेश सरकारें हर साल इसे जलाने से रोकने के लिए कई कदम उठाती हैं लेकिन जब तक किसानों को इसका कोई किफायती और समय बचाने वाला स्थायी हल नहीं मिलेगा, तब तक पराली जलाने की समस्या जस की तस बनी रहेगी।

पहले गेहूं और धान की फसल को हाथ से काटा जाता था। इसलिए फसल जमीन से सटाकर काटी जाती थी। इसमें पराली को जलाने की जरूरत नहीं होती थी। धान का पौधा 100 सेमी का होता है लेकिन हार्वेस्टर से कटाई 50-60 सेमी जमीन के ऊपर से होती है। यानी बाकी का हिस्सा पराली के रूप में खेत में ही रह जाता है।

गेहूं की फसल 140-150 दिन में तैयार होकर अप्रैल के मध्य में काटी जाती है।  15 नवंबर से पहले इसकी बुवाई हो जाती हैं धान की पकी फसल 15 अक्टूबर के बाद काटने लायक होती है। बुवाई में मात्र 20-30 दिनों का समय मिलता है। इस अल्प समय में पराली का तरीके से निस्तारण करना, खेत तैयार करना और बुवाई करना किसानों के लिए संभव नहीं होता। लिहाजा जल्दबाजी में पराली जलाना ही उन्हें सबसे किफायती उपाय लगता है।

धान की नई किस्में हो सकती हैं मददगार

धान की कम समय में तैयार होने वाली प्रजाति से किसानों को अगली फसल की तैयारी में अतिरिक्त समय मिलेगा। इसके लिए पंजाब कृषि विवि ने धान की पूसा-44 के बाद पीआर-126 प्रजाति तैयार की है जो 160 के बजाय 125 दिनों में ही तैयार हो जाती है। दूसरी तरफ, इसमें एक एकड़ में मात्र 30 क्विंटल पराली निकलती है जबकि पूसा-44 में 32 क्विंटल।

टर्बो हैप्पी मशीन कारगर तकनीक   

पराली समस्या के खात्मे में मशीनें योगदान दे सकती हैं। टर्बो हैप्पी मशीन पराली को काटकर भूसा बना लेती है और गेहूं के बीज की बुवाई कर उसी भूसे से कवर कर देती है। ऐसे में पराली को जलाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। इससे न सिर्फ समय बचता है बल्कि पराली जलाने से जमीन में नमी की कमी का खतरा भी नहीं रहता। अभी तक ऐसी 1200 मशीनें बिक चुकी हैं इसी से पंजाब में पिछले साल 67,969 के मुकाबले इस साल मात्र 39686 ही पराली जलाने के मामले सामने आए हैं। 

उत्तर भारत में पराली जला दी जाती है लेकिन देश के अन्य राज्यों में यह सुनने को नहीं मिलता है। इसका कारण है कि वहां चारे के विकल्प सीमित हैं। इसलिए वे पराली जलाने के बजाय काटकर उसका भूसा बनाते हैं। उत्तर भारत में मवेशियों को चारे की कोई समस्या नहीं है। खासतौर से गेहूं से तैयार भूसे, गन्ने का ऊपरी हिस्सा, ज्वार, बाजरा और अन्य बेहतर चारे के रूप में उपलब्ध है।

 

पराली किसानों के लिए बेकार

धान की फसल काटे जाने के बाद बचने वाली पराली किसानों के लिए बेकार है। इससे भूसा बनवाना ज्यादा महंगा है। इसलिए किसान इसे खेतों में ही जलाना पसंद करता है। इससे वह इसे कटवाने के खर्च से भी बच जाता है।

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